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“जब गेम खेल नहीं, जीवन खेलने लगे”

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“जब गेम खेल नहीं, जीवन खेलने लगे”  गेमिंग की लत पर एक मानवीय दृष्टि आज का बच्चा पहले की तरह गली में नहीं खेलता, बल्कि स्क्रीन के भीतर अपनी दुनिया बना चुका है। मोबाइल और इंटरनेट ने सुविधा तो दी है, लेकिन उसी के साथ एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी है—गेमिंग की लत। कई बार हम इसे छोटी समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत एक गहरी लत बन जाती है। अखबारों और न्यूज़ में अक्सर ऐसी खबरें देखने को मिलती हैं जहाँ बच्चे घंटों गेम खेलने के कारण पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं या मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं। यह सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि एक सामाजिक चिंता का विषय बन चुकी है। गेमिंग की लत एक ऐसी स्थिति है, जब व्यक्ति गेम खेलने को अपनी प्राथमिकता बना लेता है और बाकी सभी जरूरी काम पीछे छूट जाते हैं। यह लत धीरे-धीरे विकसित होती है— शुरुआत में कुछ मिनटों का मनोरंजन, फिर घंटों की आदत, और अंत में नियंत्रण खो देना। ऐसे बच्चे अक्सर समय का ध्यान नहीं रख पाते और उन्हें बार-बार गेम खेलने की इच्छा होती है। हाल के दिनों में कई रिपोर्ट्स में यह सामने आया है कि कुछ बच्चों ने गेम न खेलने देने पर गुस्स...

जीवन - एक परीक्षा ।

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 मनुष्य के लिये जिन्दगी अपने आप मे एक बहुत बड़ी  परीक्षा है जिसमें उसे जीवन के अनेक पड़ावों पर बहुत सारी परीक्षाएं देनी पडती हैं। जो इन  परीक्षाओं में सफल वही कामयाबियों के शिखर पर होता है। आग लगने पर कुआं खोदने की कहावत तो आपने सुनी ही  होगी कि किस प्रकार हम जब बिना तैयारी के किसी जरुरत के समय कैसे हाय तौबा  मचाते हैं और परेशान होतें हैं। जीवन मे किसी भी परीक्षा की घड़ी में  धैर्य और बुद्धि ही सबसे बडे  हथियार हैं। लेकिन ये भी बिना पूर्व तैयारी के समय पर साथ छोड सकते हैं। जिस प्रकार युध से पूर्व एक योद्धा अपने हथियारों को पैना करता है उसी प्रकार से हमे भी अपनी तैयारियां पहले से ही पूरी कर के चलना चाहिए । आलस्य जीवन में सफलता प्राप्त करने में सबसे बड़ा रोड़ा है। https://satlekhani.in/ यदि आप मेरी website पर जाना चाहते है तो यहाँ क्लिक करें 🙏 https://satlekhani.in/ अप्डेट पाने के लिए पेज follow अवश्य करें 🙏

कैसे पाएँ परीक्षा में अच्छे अंक वाली सफलता

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जैसे जैसे परीक्षाएँ नज़दीक आती जा रही हैं । विद्यार्थियों की हालत पतली होती जा रही है। अभिभावक भी अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं । वैसे ही कोरोना ने वर्ष भर पढ़ाई से दूर रखा ।स्कूल  बंद रहे । जैसे पढ़ाई से नाता ही टूट गया । सरकार ने भी कोशिश की है कि छात्रों के लिए इस चिंता को कैसे कम करें । syllabus कम करके या ओनलाइन शिक्षण की व्यवस्था करके । दोनो करने के बाद भी अभिभावकों और छात्रों दोनों की परेशानियाँ कम नहीं हो पा रही है।  कठिनाइयाँ व परिस्थितियाँ कैसी भी रहीं हों आज के समय की गलाकाट प्रतियोगिता में आगे रहने वाला ही सफल माना जाता है। अंकपत्रिका में कभी दर्ज नहीं किया जाता कि आपने किन परिस्थितियों में पढ़ाई की । खैर जीतता वही है जो मानसिक रूप से सुदृढ़ होता है। अतः सबसे पहले अपने मन में सकारात्मकता रखना ही सबसे ज़्यादा ज़रूरी मंत्र है । हमें कम समय मिला तो पाठ्यक्रम भी कम ही मिल रहा है ।  परीक्षा में अच्छे या पूरे के पूरे मार्क्स लाने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए । आगे चलिए - आगे चलिए का अर्थ अपने अध्यापक की बात काटना नहीं बल्कि (update रहिए) पाठ्यक्र...

आज़ादी - वास्तविकता

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आज़ादी - वास्तविकता  आज आजादी की पूर्व संध्या पर दिल्ली जैसे शहर में ध्वजारोहण करके कुछ विद्वान् साथियों, जिसमे विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, जातियों और वर्गों के लोग थे, उनके  स्टेज पर दिए गए सम्बोधनों को सुनते हुए कई बातें मन मस्तिष्क में गूंज रही हैं। गुलामी का अनुभव करने वाले को ही आजादी का अनुभव होगा ये सत्य है। आज की पीढ़ी में  आजादी से पहले जन्म लेने वाले कुछ ही लोग बचे हैं जिन्होंने आजादी की लड़ाई देखी  है या गुलामी का अनुभव किया है।  अपने देश में अपना झंडा उठाने तक की आजादी उस समय कितनी पीड़ादायक रही होगी ये अनुभव आज ध्वजारोहण करते हुए महसूस नहीं हो पाता  है।  फिर भी अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस बात का एहसास करने की कोशिश जारी हैजारी रहेगी कि  हमारे देश के कितने वीर सपूतों ने इस दिन के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। आज उसी बलिदान को याद करते हुए हम अपने देश का तिरंगा ऊँचा करके बड़ी शान से भारत माता की जय और जय हिन्द का नारा  बुलंद करते हैं।   आज देश कई मोर्चों पर लड़ रहा है देश के बाहर पडोसी दुश्मन देशों से और अंदर  को...

सुलेख-एक सुन्दरता ये भी ।

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  सुलेख (  Calligraphy  ) क्या आप अपनी लिखावट सुधारना चाहते हैं ?  खुद लिखें और ख़ुदा भी ना जाने कि क्या लिखा है। कभी कभी कई लोगों के साथ ऐसा भी होता है ।  क्या कभी किसी को आपकी हैंडराइटिंग देखकर भ्रम हुआ है कि आप डॉक्टर तो नहीं हैं ? क्या स्कूल में अक्सर आपको आपकी लिखावट के कारण शर्मिंदा होना पड़ता है ? या कभी कभी आपकी लिखावट के लिए आपको ये सुन ने को मिल जाता है कि क्या कीड़े मकोड़े मार कर नोट्बुक में रख दिए ? तो आपको बिल्कुल भी शर्मिंदा हताश या निराश होने की आवश्यकता नहीं है।  अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन जी ने भी अपनी आत्मकथा में अपनी ख़राब लिखावट के लिए अफ़सोस जताया है।  बताया जाता है कि महात्मा गाँधी जी का भी लेख अच्छा नहीं था।  और  क्योंकि इसे हल्की फुलकी सी विधियों द्वारा आसानी से सुंदर बनाया जा सकता है।  So be positive always.   23 जनवरी को वर्ल्ड हैंड राइटिंग डे मनाया जाता है । लिखावट के अध्ध्यन को ग्राफ़ोलोजी कहा जाता है । ग्राफोलॉजी में केवल अक्षरों की बनावट का ही विशेष महत्त्व है उसकी क्या भाषा है और...

हमारी सांस्कृतिक धरोधरों को संजोने का व्हाट एन आइडिया सरजी

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 हमारी सांस्कृतिक  धरोधरों   को संजोने का व्हाट एन आइडिया  सरजी  '' व्हाट एन आइडिया सरजी '' कुछ सालों पहले एक विज्ञापन में सुनाई देने वाला वाक्य '' व्हाट एन आइडिया सरजी '' कई लोगों के जीवन में एक नई कहानी लिख गया। आज के कई नामचीन प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में हम उन लोगों को  देखते हैं जिन्हें उनके किसी न किसी यूनीक आईडिया ने जीवन को सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। मेरे मन में भी एक आईडिया आया की आज देश के हर कोने में छोटी से छोटी दुकान पर ई वॉलेट मिल जायेगा।  मोहल्ले की सबसे छोटी दुकान किराना पनवाड़ी चाय रेहड़ीवाला सब्जीवाला हर किसी के पास  वॉलेट मौजूद है चाहे वो PAYTM , GOOGLE PAY, PHONE PE, AIRTEL कोई सा न कोई सा इ वॉलेट अवश्य मिल जाएगा।  क्या  देश की विभिन्न सांस्कृतिक धरोहरों को नहीं ढूंढा जा सकता है।  देश की अपेक्षित धरोहरों को सवांरने के लिए इसी प्रकार का कोई न कोई प्लेटफार्म सरकार  को तैयार करवाना चाहिए जहाँ हर किसी की पहुँच हो जहाँ वह इ वॉलेट के जैसे धरोहर का रजिस्ट्रेशन करा सके।  फोटो अपलोड कर स...

भारत में बेरोज़गारी का मूल कारण

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 भारत में बेरोज़गारी का मूल कारण  एक सोच जो भारतीय मन मस्तिष्क में आमतौर पर देखने में आती है कि पढ़ाई समाप्त  करने के बाद जब एक बच्चा आर्थिक तौर पर कुछ करना चाहता है तो सबसे पहला विकल्प उसे नौकरी ही नज़र आता है । क्योंकि ये एक ऐसा विकल्प होता है जिसमें उसे ज़्यादा कुछ रिस्क / जोखिम नहीं उठाना होता ।बस 30 दिन पूरे ओर सैलरी हाथ में । ये उन्हें  आय का सबसे आसान ओर सुरक्षित विकल्प दिखाई पड़ता है । जब सभी को  नौकरी चाहिए तो बेरोज़गारी की दर बढ़ना स्वाभाविक है ।  आम भारतीय युवा क्यों सबसे पहले अपनी आय के लिए नौकरी के विकल्प को चुनता है इसके लिए कई कारण ज़िम्मेवार हैं । हमारी शिक्षण नीति , पहले से ही ग़रीबी की उच्च दर , कौशल , जोखिम उठाने का डर , पारिवारिक पृष्ठभूमि आदि ।इन सबसे जूँझने के बाद एक युवा जो खोया है अपने नए नए व्यवसाय के उद्योग की उड़ान के स्वप्नों में उसे आगे कई रुकावटों का सामना करना पड़ता है । रेजिस्ट्रेशन,  टैक्स सिस्टम , noc , लाइसेन्स, बिजली कनेक्शन , पानी कनेक्शन , fire safety certificate, बिल्डिंग सर्टिफ़िकेट ,एमसीडी, वन विभाग , NGT , GST ...

गंगा जमुनी तहजीब के विश्वास की दरकती जमीन

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  गंगा जमुनी तहजीब के विश्वास की दरकती जमीन              भारत की दो पवित्र नदिया गंगा और यमुना (जमुना) और इन्ही दोनों के नाम पर एक जुमला अक्सर आपको सुनने को मिल ही जाता होगा कि हम गंगा जमुनी तहजीब की मानने वाले लोग हैं। यदा कदा  टीवी पर मीडिया में या अखबारों की सुर्खियों में आप हमेशा गंगा जमुनी तहजीब के कुछ किस्से पढ़ते रहते होंगे जिसमे हिन्दू और मुस्लिम पक्ष की कोई ना कोई अवश्य खबर अवश्य होती है। लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया होगा की हिन्दुओं के लिए पवित्र माने जाने वाली नदियों के नाम पर ये हिन्दू मुस्लिम की एकता की मिसाल कहाँ कब कैसे शुरू हुई। हालाँकि मुस्लिमों का इन नदियों के प्रति आस्था का कोई सवाल ही नहीं है।  ''गंगा जमुनी तहजीब '' मूलतः एक उर्दू  में प्रयोग किया जाने वाले  शब्दो का समूह  है जो कि गंगा और यमुना नदी के किनारे बसे हिन्दू और मुस्लिमो के लिए प्रयुक्त होता है. बाबर और औरंगजेब युग के अंत के बाद अवध क्षेत्र में इस शब्द या संस्कृति की शुरुवात हुई थी जो की भारत की संस्कृति का केंद्र है. उत्तरी मध्य भ...

ऑफिस, मीटिंग सेमिनार वेबिनार और क्लासरूम का बदलता परिवेश

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  ऑफिस, मीटिंग सेमिनार वेबिनार और क्लासरूम का बदलता परिवेश  ''आवश्यकता अविष्कार की जननी है ''  जैसे जैसे जरूरतें बढ़ती गई अविष्कार भी बढ़ते गए।  हर क्षेत्र में परिवर्तन होता रहता है या यूँ कहें परिवर्तन इस संसार का शाश्वत सत्य है जो  परिवर्तित नहीं होगा। एक थिओरी  (सर्वाइवल ऑफ़ दा फिटेस्ट )  के अनुसार वही विजेता बनेगा जो अपने आपको बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लेगा। या यूँ कहें कि हमें बदलती परिस्तिथियों के अनुसार अपने आप को ढालना हमारी मज़बूरी है अन्यथा हम अपने आपको  गलाकाट प्रतियोगिता के समय में नहीं बचा पायेंगें।  वर्तमान परिस्थितियों में ऑफिस के बजाय घर से काम करने की प्रवृति बढ़ी है। होनी भी चाहिए कोई भी बड़ी कंपनी अपनी  वर्किंग एसेट्स (स्किल्ड वर्कर्स)  को किसी भी स्थिति में खोना नहीं चाहती है।  इसलिए अधिकतर बड़ी कम्पनीयों ने अपने कर्मचारियों को घर से  ही काम  छूट दे दी है। और सरकारी गाइडलाइन के अनुसार 50% कर्मचारियों के साथ ऑफिस खोलने की परमिशन दे दी गई है।   विभिन्न विद्यालयों में विद्यार्थियों को भ...

छात्रों के लिए अध्यापक के मन की बात( in form of a letter)

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  (Work from home)                                                                            प्रिय छात्रों , सबसे पहले , सभी को सुप्रभात ! आज आपसे बात करने का मन हुआ जैसे कक्षा में जाते ही किया करता था ( actully i am missing my class )। मुझे लगता है आप भी कर रहे होंगे । समय ही ऐसा आया है । लेकिन हौसलों के आगे ये भी गुज़र जाएगा । इस कठिन समय को अपने आपको तराशने में लगाओ जिससे इस समय की उपयोगिता आपके जीवन को नयी दिशा प्रदान करे । कई बार लगता है कि ये कार्य बड़ा कठिन है कैसे होगा ? कैसे करूँगा ? कितनी मेहनत लगेगी ? हम हताश से होने लगते हैं ।और हम उस कार्य में मन न लगा पाते हैं । जिससे कार्य की गुणवत्ता गिर जाती है और विद्यार्थी को मन से कार्य नहीं करने से उस कार्य का फल काग़ज़ पर तो मिलता है परंतु  जिस उद्देश्यों को लेकर ...

सार्थकता वर्तमान समय में ऑनलाइन शिक्षा की

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       वर्तमान समय में सम्पूर्ण मानवजाति को अपना वजूद बचाए रखने के लिए जीवन जीने के तौर तरीक़े को बदलने पर ज़ोर दिया जा रहा है । अब से पहले मेल मिलाप पर ज़ोर था आज सामाजिक दूरी की धूम मची हुई है । लेकिन आज  हर कोई किसी से भी मिलने में डरा डरा सा रहता है । शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व बदलाव देखने में आ रहे हैं । जिस मोबाइल को छात्रों का विशेष दुश्मन का दर्जा था आज वही सबसे बड़े मित्र के रूप के स्थापित है । आज लगता है जैसे उनकी पूरी की पूरी शिक्षा ही मोबाइल के बिना अधूरी है ।      देश में अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है जिसके साथ साथ कोरोना की भी खुली चुनौती मिलनी शुरू हो चुकी है जैसे कोरोना वायरस हमसे कह रहा हो कि जिस भी चौराहे पर जाओगे मुझे ही पाओगे । अर्थात् देश सामुदायिक संक्रमण फैल चुका है चाहे हम इसे स्वीकार करें या ना करें। देश में कोरोना के बढ़ने की दर भयावह होती जा रही है । संक्रमितों के आँकड़े डरावने होते जा रहे हैं । हर पाँच दिन में एक लाख का आँकड़ा बढ़ रहा है आने वाले दिनों की सोच कर ही कलेजा मुँह को आता है। भारत की अत्यधिक जनसं...