सार्थकता वर्तमान समय में ऑनलाइन शिक्षा की
वर्तमान समय में सम्पूर्ण मानवजाति को अपना वजूद बचाए रखने के लिए जीवन जीने के तौर तरीक़े को बदलने पर ज़ोर दिया जा रहा है । अब से पहले मेल मिलाप पर ज़ोर था आज सामाजिक दूरी की धूम मची हुई है ।लेकिन आज हर कोई किसी से भी मिलने में डरा डरा सा रहता है । शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व बदलाव देखने में आ रहे हैं । जिस मोबाइल को छात्रों का विशेष दुश्मन का दर्जा था आज वही सबसे बड़े मित्र के रूप के स्थापित है । आज लगता है जैसे उनकी पूरी की पूरी शिक्षा ही मोबाइल के बिना अधूरी है ।
देश में अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है जिसके साथ साथ कोरोना की भी खुली चुनौती मिलनी शुरू हो चुकी है जैसे कोरोना वायरस हमसे कह रहा हो कि जिस भी चौराहे पर जाओगे मुझे ही पाओगे । अर्थात् देश सामुदायिक संक्रमण फैल चुका है चाहे हम इसे स्वीकार करें या ना करें।
देश में कोरोना के बढ़ने की दर भयावह होती जा रही है । संक्रमितों के आँकड़े डरावने होते जा रहे हैं । हर पाँच दिन में एक लाख का आँकड़ा बढ़ रहा है आने वाले दिनों की सोच कर ही कलेजा मुँह को आता है। भारत की अत्यधिक जनसंख्या के कारण कोरोना सम्बंधित सभी आँकड़ों में भारत की स्तिथि अन्य देशों की तुलना में ये बेहतर नज़र आती हैं।
ऐसे समय में स्कूल को खोलने की बात करना अपने आप को धोखा देने जैसा है। और विद्यालय खुले भी तो पूर्ववर्ती सभी किर्याकलापों का स्वरूप बदल चुका होगा छात्रों को उसने ढलने में समय लगेगा ओर उन्हें नियमित ट्रेनिंग की आवश्यकता भी होगी । इस धरती पर कोई माँ बाप (अभिभावक) होंगे जो अपने बच्चों को इस माहौल में विद्यालय भेजें। ओर यदि कोई भेज भी दे तो जब तक उसका बच्चा विद्यालय में रहेगा उसका मन अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर आशंकित रहेगा ।और बच्चों के स्वास्थ्य ओर सुरक्षा से खिलवाड़ भी नाही किया जा सकता है ।
कुछ भी हो जीवन जारी रहना है और जारी रहेगा इसमें कोई दो राय नहीं हैं ।और आज देश विदेश के शिक्षाविद, अध्यापक व शिक्षा से जुड़े अन्य लोगों के कंधों पर विशेष ज़िम्मेवारी है । वर्तमान परिपेक्ष में शिक्षा के उद्देश्यों को को प्राप्त करने की ज़िम्मेवारी ।
केंद्र सरकार ओर विभिन्न राज्यों सरकारों ने ऑनलाइन शिक्षा के लिए आदेश एवं दिशा निर्देश जारी कर दिए । ऐसा करके शायद उन्होंने कोशिश की अपनी ज़िम्मेदारी को निभाने की ।ऐसा करके वो अपनी राजनीतिक मार्केटिंग भी कर रहे हैं ।या हो सकता है वास्तव में वो समाज कल्याण कर रहे हों । परंतु हम ऐसा कर तो रहे हैं किंतु किस क़ीमत पर । क्या अपने बच्चों की मानसिक स्तिथि का ध्यान रखा जा रहा है । क्या इतनी छोटी उम्र में बच्चे इंटरनेट में फैली अश्लीलता और हिंसा से अपने आपको अछूता रख पाएँगे । इतने अधिक समय तक फ़ोन लैप्टॉप कम्प्यूटर टीवी स्क्रीन पर आँखे लगाए रखने के प्रभावों को नन्ही सी जान झेल पाएँगी ।बच्चों का मन अत्यंत कोमल होता है । इंटर्नेट में व्याप्त बुराइयों से बहुत जल्दी प्रभावित होगा । उनके बचपन का क्या होगा जिसे दोबारा जीने की चाह हर युवा ओर बुजुर्ग के मन में दबी हुई होती है । इन बच्चों के बचपन की क़ीमत पर हम उन्हें किन आदर्शों की पढ़ाई की दुहाई दे रहे हैं । आज बदलते परिवेश में जीवन मूल्यों में आदर्शों में आमूलचूल परिवर्तन आने जा रहा है। कैसे हम ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से इसे छात्रों में परिलक्षित कर सकते इस पर गहन अध्ध्यन की अत्यंत आवश्यकता है।
क्या वर्तमान के सभी शिक्षाविद एवं अध्यापक ऑनलाइन कक्षाओं के लिए प्रशिक्षित हैं । क्या ऑनलाइन कांटेंट तैयार कारने के लिए आज तक कभी कोई प्रशिक्षण अध्यापकों को दिया गया है । यदि मात्र वर्कशीट्स को सोशल मीडिया पर छात्रों को शेयर कर देने से शिक्षा का सभी उद्देश्यों की पूर्ति की जा सकती है । यदि यही शिक्षा है तो हर पिता को अपने बच्चों को केवल एक वर्कशीट की किताब लाकर दे देनी चाहिए ।
नहीं, केवल ऑनलाइन कक्षाओं के संचालन मात्र से शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं की का सकती है। प्राइवेट स्कूल केवल ओर केवल अपने विद्यालय के आर्थिक हितों के लिए ही ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन कर रहे है जिससे अभिभावकों से इस गुज़रे समय (जब विद्यालय बंद थे) की मोटी फ़ीस वसूली जा सके । जबकि उनके पास कोई भी रीसर्च आधारित शिक्षण पद्धति नहीं है जो मनौवेज्ञानिक रूप से सक्षम हो या एक व्यवस्थित रूप में हो । ज़्यादातर अध्यापक ऑनलाइन कक्षाओं के नाम पर इंटर्नेट से अलग अलग वर्कशीट डाउनलोड करके छात्रों को अव्यवस्थित कबाड़ा परोस कर अपने कार्य की पूर्ति कर रहे हैं ।और छात्र अपने अभिभावकों ओर सामाजिक दवाबों के कारण इस कचरे को स्वीकार करने को मजबूर हैं ।हर तरह का कूड़ा कचरा उन्हें परोस दिया जा रहा है ।
ऑनलाइन शिक्षण हेतु आवश्यकता होती है एक स्मार्ट फ़ोन, कम्प्यूटर, इंटर्नेट, स्मार्ट टीवी, वेब कैमरा , हेड्फ़ोन, बैठने का उचित स्थान इत्यादि । भारत में आज लगभग 1% आबादी के पास स्मार्ट टीवी है । ऐसे में कैसे सरकार दावे भर सकती है कि उन्होंने सभी को शिक्षा का समान अधिकार दिया है । गरीब अतिगरीब ओर यहाँ तक की निम्न मध्यम वर्ग भी अभी इस से अछूता है । उनकी पहुँच नहीं है इन संसाधनों तक । क्या इन्हें ऑनलाइन शिक्षा का अधिकार नहीं है । उस छात्र पर क्या गुजरती है जब ऑनलाइन शिक्षा तो चालू है पर उसके पास साधन नहीं है ओर वो अपने को पिछड़ता देखता है । एक अभिभावक की मनोस्तिथि को AC में बैठे नीति निर्धारक शायद ही समझ पाएँ। स्तिथि का आँकलन मात्र इस बात से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दिल्ली एनसीआर जैसे विकसित क्षेत्र के गावों में कितने घरों में स्मार्ट टीवी है । मेरे गाँव में लगभग 15000 की आबादी वाले क्षेत्र में 1000 लोगों तक ही ऑनलाइन शिक्षण संसाधनों की पहुँच है। बाक़ियों का क्या ?
प्रत्येक छात्र अपने आप में यूनीक है उसकी सीखने की क्षमता अलग अलग है जो कि कक्षा कक्ष में अध्यापक के अनुभव के आधार पर ही परखी जा सकती है । जो किसी कम्प्यूटर आधारित शिक्षण में नहीं है ।
अपने नौनिहालों के हितों को ध्यान में रखते हुए ओर नए तरीक़े खोजने की ज़रूरत है । ऐसे तरीक़ों पर अनुसंधान की अत्यंत आवश्यकता है जिसमें छात्रों पर मानसिक प्रभाव का विशेष ध्यान रखा जाए । देश के भविष्य को इस प्रकार इंटरनेट के हवाले कर देना असुरक्षित जान पड़ता है । जैसे देश के भविष्य का नियंत्रण अनियंत्रित इंटरनेट करेगा तो देश किस राह पर चलेगा ये सोचने की बात है । रही बात छात्रों के लिए स्कूल खोलने की तो एक साल अगर नहीं भी पढ़े तो कोई आसमान नहीं फट जाएगा । यह सत्र ज़ीरो सेशन भी घोषित किया जा सकता है । बच्चों को बचपन जीने से वंचित न किया जाना चाहिए । इस पढ़ाई को पूरा करने के दबाव में हम छात्रों को अवसाद की ओर तो नहीं धकेल रहे ।हमें शिक्षण के अन्य विकल्प तलाशने चाहिए ।कोई मध्यम मार्ग जिससे साँप भी मर जाए ओर लाठी भी ना टूटे । हमें भी अपने पढ़ाने के तरीक़ों को भी अप्डेटेड वर्ज़न के साथ शिक्षण में उतरना पड़ेगा । आज के इस कठिन दौर में अध्यापक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चली है ।
सतीश कुमार
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