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अनदेखे घाव, अनसुनी कहानियाँ

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  साहब के औचक निरीक्षण दौरे पर आने की खबर जैसे ही ऑफ़िस में पहुँची, माहौल अचानक बदल गया। अभी तक जो लोग आराम से अपनी कुर्सियों पर बैठे काम कर रहे थे, वे अब फुर्ती में आ गए। कोई फ़ाइलों की धूल झाड़ रहा है, कोई रजिस्टर ठीक कर रहा है, तो कोई पुरानी पड़ी फाइलों को नए कवर में सजा रहा है। चपरासी बार-बार एक टेबल से दूसरी टेबल तक दौड़ रहा है—“साहब ने वो फ़ाइल माँगी है… जल्दी दीजिए।” कहीं घबराहट है, कहीं जल्दबाज़ी, और कहीं दिखावे की एक अनकही कोशिश—सब कुछ एकदम व्यवस्थित दिखाने की। साहब आने वाले हैं… और साहब का मतलब है—अनुशासन, दबाव, और एक अलग ही प्रकार की ऊर्जा। सच कहें तो “साहब” शब्द सुनते ही हमारे मन में एक छवि बन जाती है—सूट-बूट पहने, तेज़ चाल से चलते हुए, कम बोलने वाले, और जिनकी एक नज़र ही बहुत कुछ कह देती है। उनका रौब ऐसा होता है कि लोग सीधे बैठ जाते हैं, आवाज़ें धीमी हो जाती हैं, और काम अचानक तेज़ हो जाता है। पर क्या कभी हमने सोचा है कि इस “रौब” के पीछे कितनी कहानियाँ छिपी होती हैं? जिस तरह एक चमकदार सूट के नीचे पुराने पैबंद छिपे होते हैं, उसी तरह एक साहब के व्यक्तित्व के पीछे संघर्ष ...