गंगा जमुनी तहजीब के विश्वास की दरकती जमीन
गंगा जमुनी तहजीब के विश्वास की दरकती जमीन
भारत की दो पवित्र नदिया गंगा और यमुना (जमुना) और इन्ही दोनों के नाम पर एक जुमला अक्सर आपको सुनने को मिल ही जाता होगा कि हम गंगा जमुनी तहजीब की मानने वाले लोग हैं। यदा कदा टीवी पर मीडिया में या अखबारों की सुर्खियों में आप हमेशा गंगा जमुनी तहजीब के कुछ किस्से पढ़ते रहते होंगे जिसमे हिन्दू और मुस्लिम पक्ष की कोई ना कोई अवश्य खबर अवश्य होती है। लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया होगा की हिन्दुओं के लिए पवित्र माने जाने वाली नदियों के नाम पर ये हिन्दू मुस्लिम की एकता की मिसाल कहाँ कब कैसे शुरू हुई। हालाँकि मुस्लिमों का इन नदियों के प्रति आस्था का कोई सवाल ही नहीं है।
''गंगा जमुनी तहजीब '' मूलतः एक उर्दू में प्रयोग किया जाने वाले शब्दो का समूह है जो कि गंगा और यमुना नदी के किनारे बसे हिन्दू और मुस्लिमो के लिए प्रयुक्त होता है. बाबर और औरंगजेब युग के अंत के बाद अवध क्षेत्र में इस शब्द या संस्कृति की शुरुवात हुई थी जो की भारत की संस्कृति का केंद्र है. उत्तरी मध्य भारत जो कि केंद्र है गंगा जमुनी तहजीब का, जमुना किनारे होने से दिल्ली भी इसी में आती है और इन्ही से इसकी शुरुआत हुई थी. हालाँकि 1724 से अवध की निजाम शादम खान जो की पारसी मूल से थे ने इसकी शुरुवात करवाई थी और सौहार्द स्थापित किया था.
गंगा जमुनी तहजीब में नदियों के नाम का इस्तेमाल केवल इलाको में रिहाइश के आधार पर ही किया गया है आस्था के आधार पर नहीं. इस तहजीब का सीधा सीधा अर्थ लगाया जाता है की की हिन्दू मुस्लिम की और मुस्लिम हिन्दू धर्म की आस्था मान्यताओं का सम्मान करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। दोनों को ही न तो आपत्ति हो एक दूसरे के धर्म और मान्यताओं से और न ही एक दूसरे की मान्यताओं का विरोध होता है।
वर्षों से जिस गंगा जमुनी तहजीब का हवाला देकर हम अपने बच्चों को भारत की विभिन्नता में एकता का पाठ पढ़ाते आएं हैं आज उनके मुख से निकलने वाले तीखे सवालों का जवाब हमारे लिए अत्यंत दुष्कर होता जा रहा है। हालाँकि ज्यादातर सवाल हमारी आस्थाओं से जुड़े होतें हैं जिनके आगे तर्क नहीं चलते। चलती हैं तो केवल आस्था और विश्वास की दलीलें। परन्तु आज के सोशल मीडिया के ज़माने में कैसे और कब तक नई पीढ़ी को बहलाया जाता रहेगा। हालाँकि जबसे तुष्टिकरण की राजनीती आई है तब से ये तहजीब नाम मात्र की रह गई है और एक दूसरे के धर्म और आस्थाओ का विरोध और उनका मजाक अब आम है। आज की तेज टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के प्लेटफार्म से लगभग पूरी दुनिया की दूरियां सिमटती जा रहीं हैं वहीँ उनके दिलों में इंसान और मानवता के प्रति दूरियां बढ़ती जा रही हैं।
भारत में वर्षों से हिन्दू मुस्लिम एकसाथ मिलजुलकर रहते आये हैं। गावं देहात में अभी तक भी दोनों समुदाय के लोगों के बीच में प्रेम और सौहार्द की परंपरा बरक़रार है। जब हिन्दू की दिवाली आती है तो मुस्लमान भी मिठाई गले मिलकर खाता है और जब मुस्लिम की ईद आती है तो हिन्दू भी उस से ईद पर ईदी लेता है। ना राम में न रहीम में कोई अंतर समझा जाता है। घरों तक में आना जाना बदस्तूर जारी है। मस्जिद की अजान और मंदिर का कीर्तन /जागरण कहीं कोई अंतर नहीं। दुआ सलाम में राम राम का वाचन आमतौर पर सुना जा सकता है। फिर ऐसा क्या हो गया ? कौन सी घटना घट गई कि आज इस विश्वास की जमीन दरकने लगी है। दोनों समुदाय में संदेह और असुरक्षा की भावना महसूस की जा रही है। क्यों मुस्लिम समुदाय के बड़े बड़े नेता अभिनेता यहाँ तक कि राष्ट्रपति तक असुरक्षा की भावना का जिक्र करतें हैं।? क्यों मुस्लिम मोहल्ले से निकलते हुए हिन्दू का हलक सूखने लगता है? क्यों आज देश में दंगे भड़क जाते हैं ? क्यों ये नफरत आज के बच्चों और युवाओ में बढ़ती जा रही है ? क्या कुछ ताकतें हैं जो हमारी भावनाओं से खेलकर अपना उल्लू सीधा कर रहीं हैं ? कौन हैं वो लोग जो दोनों के बीच के विश्वास की दीवार को और कमजोर और कमजोर करते जा रहे हैं ? क्या ये व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी है ,IT CELL या सोशल मीडिया या देश की कोई और विरोधी ताकत है ?
पिछले कुछ समय में घटित घटनाएं क्या उनका असर हुआ आइये एकबार सोचें दिल्ली दंगे , तब्लीगी जमात, धारा 370 ,CAA, NRC , राम मंदिर /बाबरी मस्जिद , ये पिछले दिनों की कुछ प्रमुख घटनाएं हैं इसके आलावा अलग अलग समुदाय द्वारा कट्टरपंथी भाषणबाजी तो आजकल की आम बात हो चली है। लेकिन सभी के द्वारा हिन्दू मुस्लिम के बीच की गंगा जमुनी तहजीब के विश्वास को कमजोर किया गया है। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की बात नहीं बल्कि बात विश्वास की है। जोकि आज के समय में एक महत्वपूर्ण सवाल देश के समक्ष खड़ा हो गया है।
सोशल मीडिया के द्वारा हर छोटी बड़ी घटना का वर्णन इस तरह से हो रहा है जैसे कि सीधा हमला या तो सारे हिन्दुओं पर हो रहा है या सारे मुस्लिमों पर। आज इस विश्वास को मजबूत करने की जिम्मेवारी देश के युवाओं पर है। शिक्षा के द्वारा ही इस जिम्मेदारी को समझने की समझ विकसित की जा सकती है। इस गंगा जमुनी तहजीब के विश्वास को कायम करने के लिए दोनों समुदाय के वरिष्ठ लोगों को आगे आकर जिम्मेवारीपूर्ण व्हवहार का प्रदर्शन करना चाहिए। एवं हिन्दुओं या मुस्लिमों दोनों को अपनी अगली नस्ल में जहर के बजाय सौहार्द के संस्कार के बीजों का रोपण करना चाहिए।
इसके बाद सबसे बड़ी जिम्मेवारी आती है देश की सरकार की जिससे बहुत ही बारीकी से अपनी नीतियों और कृत्यों से इस विश्वास को और मजबूती देनी चाहिए। किस भी समुदाय को नहीं लगना चाहिए कि उनके साथ गलत हुआ है। सभी को साथ लेकर चलना सभी के लिए कार्य करना ही इस विश्वास को मजबूत करेगा।
इसके बाद की जिम्मेवारी आती है अध्यापक वर्ग की जिनके लिए कोई मायने न रखता की शिक्षार्थी किस समुदाय का है। जब तक बच्चा स्कूल में रहता है तो वह केवल एक बच्चा ही रहता है परन्तु कैसे स्कूल से निकलते ही वह हिन्दू या मुस्लमान हो जाता है। आखिर क्यों? कई सवाल है लेकिन जवाब नहीं मिलता लगता है जैसे ये गंगा जमुना तहजीब कहीं केवल शब्दों में ही न रह जाये।
सतीश कुमार
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