हमारे स्कूलों से नौकरी ढूँढने वाले बच्चे ही क्यों निकलते हैं ?
हमारे स्कूलों से नौकरी ढूँढने वाले बच्चे ही क्यों निकलते हैं ?
अत्यंत हर्ष का विषय है कि दिल्ली की शिक्षा क्रांति एवं दिल्ली शिक्षा प्रारूप की चर्चा सर्वत्र है दिल्ली के छात्रों का प्रदर्शन मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों पक्षों में सराहनीय है।आज जो यहाँ के छात्र शिक्षा के क्षेत्र में नए नए आयाम गढ़ रहे हैं उसमें दिल्ली के उपमुख्यमंत्री एवं शिक्षामंत्री माननीय श्री मनीष सिसोदिया जी के सफल निर्देशन में अध्यापकों की अथक मेहनत का विशेष योगदान है दिल्ली के सरकारी विद्यालयों के छात्र आज प्राइवेट स्कूलों के छात्रों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं यह सब विगत वर्षों में दिल्ली की शिक्षा प्रणाली में किए गए बदलावों का परिणाम है कि आज दिल्ली के छात्रों के लिए ढांचागत सुविधाओं में किया गया बदलाव एवं अध्यापकों में प्रेरणा हेतु विभिन्न प्रशिक्षण जो देश विदेश में कराए गए इसके परिणाम सभी के सामने है।
बहुत सारी अच्छी अच्छी बातों के साथ साथ एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि दिल्ली के सरकारी विद्यालयों के छात्र केवल नौकरी तलाशने वाले छात्र ही क्यों रहे जाते हैं।
प्राचीन प्रारूप में शिक्षा का उद्देश्य जीवन जीने के तरीकों पर केंद्रित था परंतु वर्तमान परिस्थितियों एवं शिक्षा प्रणाली के कारण केवल नौकरी प्राप्त करना विद्यार्थी जीवन का एक मात्र लक्ष्य रह गया है । आज की शिक्षा काम चलाऊ वस्तु बनकर रह गई है अर्थात मात्र नौकरी पाने तक सीमित रह गई है केवल परीक्षा पास करना शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य रह गया है जबकि ज्ञान का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण ही होना चाहिए और जब व्यवस्था ऐसी हो जिसमें अध्यापक अपनी नौकरी बचाने के लिए पढ़ा रहा हो और छात्र केवल नौकरी पाने के लिए पढ़ रहे हो तो कैसे वास्तविक लक्ष्य प्राप्त होंगे । आजकल विद्या और नौकरी एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द बन रहे हैं ।छात्रो में इस मानसिकता के कई कारण हैं इनमें से सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला कारक छात्रों की पारिवारिक पृष्ठभूमि है जब सरकारी एवं प्राइवेट स्कूल के छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन की तुलना की जाती है तो केवल और केवल उनकी अंक तालिका के आधार पर की जाती है ।जीवन मूल्यों या परिस्थितियों पर नहीं सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों को किन कठिन परिस्थितियों में किन परेशानियों से परिवार में जूझना पड़ता है यह वही जानते हैं सरकारी नीतियों के चलते नि शुल्क शिक्षा तो उन्हें मिल पा रही है लेकिन छात्र के अट्ठारह वर्ष पूर्ण होते होते ही उसके माता पिता की अपने पुत्र के कमाने की आशाएँ बढ़ती चली जाती है और छात्र इन बढ़ती आशाओं के बोझ को लेकर बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करता है।
नौकरी के लिए कोई लागत नहीं होना, कोई जोखिम न होना . प्रथम दिवस से आय होना एवं मानसिकरूप से आर्थिक सुरक्षा की भावना का होना सभी को नौकरी की और लालायित करता है ।छात्रों के कमज़ोर आर्थिक हालात जहाँ एक तरफ़ उन्हें उच्च शिक्षा से वंचित करते हैं वहीं उनमे किसी अपने व्यवसाय को शुरू करने की हिम्मत को भी तोड़ देते हैं बिना पूंजी के किसी भी व्यवसायिक का आरंभ करना नामुमकिन सा होता है यदि कोई हिम्मत भी करे तो सफलता की कोई गारंटी नहीं होती है और बड़े बूढ़ों की एक कहावत है कि औछी पंजी स्वयं पूँजी को ही खा जाती है अर्थात कम पूंजी या पूंजी के अभाव में व्यवसाय सफल नहीं हो पाते हैं सरकारी विद्यालय में अधिकतर छात्रों की पारिवारिक पृष्ठभूमि आते निम्न वर्ग से मध्यम निम्नवर्ग तक ही है ऐसे परिवार के बच्चों का जीवन अभावग्रस्त अवस्था में विभिन्न परिस्थितियों से जूझते हुए गुज़रता है इसी अभावग्रस्त जीवनशैली में जीते जीते एक किशोर मन भौतिक जीवन की उच्च आकांक्षाएं पाल लेता है उसे स्वयं इसका आभास नहीं होता । वर्तमान शिक्षा प्रणाली में उच्च अंक अर्थात उच्च वेतन की नौकरी का तय होना माना जाता है । एक छात्र मेधावी हो सकता है परंतु उसके जीवन मूल्यों का निर्धारण हमारी वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली नहीं कर सकती है अधिक अंक अर्थात अधिक मेधावी और अधिक तर्कशील छात्र परंतु उसके जीवन मूल्यों का मापन नहीं होता है ।अब एक अभाव ग्रस्त परिवार से आने वाले छात्र के मन में जल्दी से जल्दी अच्छी नौकरी प्राप्त करके जल्दी इस अभावग्रस्त जीवन से मुक्ति का सपना रहा रहता है जिससे वह केवल नौकरी प्राप्त करके ही पाना चाहता है और इसके अलावा और कोई विकल्प भी उसके पास नहीं होता है।
सतीश कुमार
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